Wednesday, September 13, 2023

आज जनसत्ता में लेख --शब्दों की आचार संहिता 
14 सितंबर 2023 


 

Monday, August 21, 2023

प्रजातंत्र में मेरा लेख 20 /08/2023 
एक बार अपने दिमाग से किसी भी तरह  के वाम /दक्षिण /मार्क्स /लेनिन /माओ/प्रगतिशील / और वे तमाम वाद और धारा को निकाल कर महसूस करें  उस स्वतंत्रता को जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी है  | जिसमें तृप्ति तुम्हारा मौलिक अधिकार है | सरकारी दफ्तरों का जो कर सको विरोध, देर से या न पहुँचने वाली सेवा का तो तुम स्वतंत्र हो | पेंट बुशर्ट पहनकर कुर्सी पर बैठ जाने वाला पढ़ा लिखा बाबू भी 'अपने अंडर'  गुलामी करवाना जानता है कितनी सारी  छोटी –छोटी भीतरी गुलामियां अभी बाकी है | जिस प्रशासन की नजर से अब तुम्हारे बहुत से काम अप्रासंगिक हो चुके हैं उसकी गुलामी | अंग्रेजों के ज़माने से ही हर साक्षर आदमी हाकिम बनना चाहता है., लेकिन साक्षर होने क़े बाद हमें  अपनी जातीय गरिमा के अनुरूप काम मिलेगा  या योग्यता के अनुरूप यह तय करने का अधिकार आज भी हमारे पास नहीं है | काम मिलेगा भी या नहीं हम तो ये भी नहीं जानते क्योकि हमें  मुफ्त अनाज देकर पेट भर दिया जाता है जुबान स्वतः बंद हो जाती है | तमाम किस्म के विकास के लाभ तो पहले ही लूट की बलि चढ़ जाते हैं | भ्रष्टाचार की सहज  सुविधाएं उपलब्ध है | किसी की तरक्की में कोई बाबू या प्रशासनिक अधिकारी अपनी कुर्बानी नहीं देना चाहता |
 इधर ‘’उपभोक्ता बाजार की पहुँच का भयावह विस्तार जहाँ एक ओर 'बाजार' की पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर हर तरह एक जैसा ''ब्रैंड साम्राज्य'' स्थापित करने पर उतारू है , तो दूसरी तरफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी के अविश्सनीय विस्तार ने विकास एवं संस्कृति के पुराने समीकरणों को असंगत बनाना शुरू कर दिया है |




 

Sunday, July 16, 2023

Monday, June 26, 2023

 फेसबुक पोस्ट (25 जून 2023 को लिखी गई )

(वायरल )

पहुँच  --20,61 ,675    

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https://www.facebook.com/100028066941929/posts/1307691680176384/?mibextid=rS40aB7S9Ucbxw6v

Sunday, June 25, 2023

आप शोध कार्य (पीएच-डी.) क्यों करना चाहती  हैं ?
शोध कार्य की 'राह में आड़े' आने वाले  अयाचित रोड़े भी एक रिसर्च का विषय हैं |  
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'आप पीएच-डी.क्यों कर रहीं हैं ? 'शीर्षक से दो दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी जो 
इस रूप में प्रसारित, संप्रेषित /वायरल हुई  
5.6 k -like 
600  -share 
पहुँच --20,61 ,675     
(दरअसल में  वह एक संवाद था )
उस पोस्ट को खबर के साथ हिन्दुस्तान मेल में बखूबी  प्रकाशित किया गया 







 

Sunday, April 30, 2023













 

 मेरे आकर्षण का केंद्र सदा यह नाभि कुंड रहा...

सौंदर्य की नदी माँ नर्मदा

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जिसके बारे में तरह- तरह की मान्यताएं सुनी उसके बारे में जानने की जिज्ञासा अब भी वैसी ही है |भले ही सदियों से इन धाराओं में छोटे-छोटे अनगिनत प्रपात फड़फड़ा रहे हैं।लेकिन हम जाने किस ओर भागे जा रहें हैं किनारों पर आज भी जीवन वही है लेकिन उन किनारों से हम किनार कर गए |यही वो जगह है जिसके हरेक कोने के साथ बचपन की इतनी स्मृतियाँ जुड़ीं हैं जिसे देखते ही मन पीछे की ओर खींचा चला जाता है|कईं बार मंत्रोच्चार के साथ माँ ,नर्मदा तट पर कन्या भोजन कर नागर जी की रामकथा भी सुनी | केवल लँगोटी और तूँबी के साथ यात्रा के परकम्मावासियों का एक जत्था सदा तट की रौनक बनाए रखता |इन दिनों रात के अँधेरे में उतरता जल भी निहारा और चढ़ते सूरज के साथ जल की झिलमिल छवि भी बांधे रखी|नाविक नाभि कुंड तक अपनी नाव ले जाता | हम भी कुमकुम अक्षत चढ़ा तेज लहरों के साथ लौट आते | लेकिन मेरा ाआकर्षण सदा वो नाभि कुंड ही रहा जिसके बारे में बहुत सी मान्यताएं जुड़ी हैं आज भी |मंदिर तट और पर्वत श्रंखलाओं की त्रिवेणी जैसे जनम जनम का साथ हो | सौंदर्य की नदी माँ नर्मदा के दर्शन सौभाग्य से मिलते है|

 मॉडर्न होने के लिए कुछ परम्पराओं को नकार ही दिया

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एक अलग किस्म के मनोरोगी बनने की दौड़ सी लगी है।

एक तरफ हमारा मीडिया मुक्त मंडी को विस्तार दे रहा दूसरी ओर उसी अख़बार के दूसरे पृष्ठ पर संस्कृति बचाओं के नारे लगा रहा। ये दोनों एक साथ कैसे संभव है?

ऐसी कौन सी असुरक्षा की भावना है जिसके चलते समाज का मूल ढांचा दरक रहा।

एक सर्वेक्षण में पता चलता है समलैंगिक 'विवाह'  के लिए आमद होने वालों में ज्यादातर संख्या महिलाओं की है।

कितना संवेदनशील विषय है. बल्कि गहन मनोविश्लेषण की मांग करता है..

 ऐसी महिलाओं (अभी सिर्फ महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में )की स्थिति का नेपथ्य क्या होगा जिसको वजह से समलैंगिक साथ को विवाह का लेबल देने की मुहीम छेड़े हैं..

उनके साथ घटित हुई घटनाएं (बलात्कार /विवाह विच्छेद /बचपन का कोई निर्मम अनुभव /असुरक्षा का हावी होना )

एक वजह यहभी उनमे से कुछ सहवास के उस सकारात्मक पक्ष तक पहुंच ही न सकी जिसे भारतीय परम्परा में स्त्री विवाह के कानूनी अधिकार के साथ जीती है। बहुत सूक्ष्म बिंदु है यह ..

धारा के विपरीत कोई कदम क्यों उठाता है?

दुखद यह भी है कि हमारे देश में सेक्स एक बड़ा सीमित बल्कि सताया हुआ शब्द है। पश्चिम चिंतन के नारीवाद के देह से प्रभावित। या यूं कहें रति लम्पटता, शरीरवाद..

हमारे यहाँ काम की सामाजिक -सांस्कृतिक धुरियों को कभी समझा ही नहीं गया.. ऐसे में इसे विवाह जैसे भारतीय संस्कार का लेबल देने पर विचार करना भी न्यायसंगत नहीं..

हम एक ऐसे समय हैं जहाँ सेक्स  विवाह के दायरे से बहुत बाहर आ चुका है...

प्रदर्शन और मीडिया इसका जितना लाभ ले सकता है लेता है।

कुल मिलाकर एक खुला व्याभिचार।

आचार्य हजारी प्रसाद द्वेदी जी की एक कृति है --प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद

कृष्णदत्त पालीवाल जी ने इस कृति का उल्लेख (कुछ व्याख्या के साथ )किया है जिसमें वे स्पष्ट लिखते हैं--

हमारे देश में इसे (सेक्स एजुकेशन )को व्यापार की दृष्टि  से ग्राहक को लूटने का एक माध्यम बना लिया है. मनमाने ढंग से सेक्स के अनगिनत चित्र छाप दिए हैं. बच्चे -जवान -बूढ़े इसे एकांत का मादक मसाला समझकर खरीद लेते हैं...

अब आप क्या कहेँगे...

जहाँ आज पूरा समाज दबी छिपी आवाज़ में ही सही, विज्ञापन की भाषा में ही सही भीतर ही भीतर मान लेता है कि सेक्स से बड़ा कोई सुख नहीं ऐसे में समलैंगिक विवाह जैसा विषय (महिलाओं के विशेष संदर्भ में )बहुत गहन अध्ययन की मांग करता है...

हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी कामसूत्र को सिर्फ और सिर्फ पश्चिम की भाषा में समझते हैं। वे नारी को नर की पूरक देहवाद से अधिक सोच नहीं पाते बहुत सुंदर बात इस संदर्भ में पढ़ी थी

'कला में जीवन दोबारा अपने को रचता है --पुनर्नवा करता है।'

हिंदी साहित्य के जिन अध्यताओं ने कामायनी पढ़ी है वे शायद समझते होंगे कामायनी में काम कला के आधार पर ही शैव -दर्शन के नये काव्यदर्शन में ढली है।

हम मॉडर्न युग में है शायद इसलिए ऐसे विषयों को भारतीय परम्परा के परिप्रेक्ष्य में देखने के बजाय, समलैंगिक विवाह जैसे विषयों पर खुलकर बात करने के बजाय, विज्ञापन के उस अर्थशास्त्र को समृद्ध कर रहे जिससे पूरा समाजशास्त्र दरक रहा।

आप स्वीकार करें न करें लेकिन समलैंगिक को विवाह जैसे लेबल की जरूरत का एक पक्ष यह भी है जिस पर खुलकर बात की नहीं जाती un महिलाओं के मन को टटोला नहीं जाता जिनके मन में सम्भवतः सेक्स जैसे विषय को लेकर सिर्फ घृणा ही उपजती है... यह विषय विवाद का नहीं,, पक्ष या विपक्ष का नहीं,, किसी सरकार या अदालत के फैंसले का नहीं बल्कि समाज की उस निर्मम स्थिति पर  गहन विचार चिंतन मांगता है जिस पर बात करने से हम कतरा रहे..

साथ रहने के लिए उसे विवाह का लेबल देना क्या महज़ सम्पत्ति के अधिकार कोप्राप्त करने की कानूनी मान्यता है?

डॉ शोभा जैन 














 

भीतर के बरअक्स बाहर मेरा लेख 


 

जनसत्ता में प्रकाशित मेरे  लेख पर पाठकीय पत्र 



 

बी. डी. तोषनीवाल उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय  ,,ग्राम  पालिया